आंवला नवमी की कथा | nirale rang

आंवला नवमी की कथा 2020 

कार्तिक शुक्ल पक्ष नवमी को आंवला नवमी का व्रत किया जाता है। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा होती है।



था- पौराणिक कथाओं के अनुसार काशी नगरी में एक धार्मिक प्रवृत्ति के वणिक दम्पति रहते थे। उनके कोई संतान नहीं थी। इस कारण वे दोनों उदास रहते थे। वणिक की उदास पत्नी को देख उसकी एक सखी ने कहा कि 'यदि तुम किसी बच्चे की बलि भैरव के नाम चढ़ा दो, तो तुम्हें पुत्र प्राप्ति हो सकती है।'
पत्नी ने यह बात जब अपने पति को बताई तो उसने बलि चढाने से मना कर दिया. परन्तु  वणिक की पत्नी इस बात को भूली नहीं। मौका पाकर एक दिन उसने एक बच्चे को भैरव देवता के नाम पर कुए में गिरा कर बलि दे दी।

इस हत्या का परिणाम उल्टा हुआ। लाभ के स्थान पर वणिक की पत्नी के शरीर में कोढ़ निकल आए तथा उस बच्चे की प्रेत आत्मा उसे सताने लगी। पत्नी की इस दुर्दशा को देख वणिक ने इसका कारण पूछा, तो पत्नी ने सारी घटना उसे सच-सच बता दी। सच्चाई जानकर वणिक बहुत दुखी हुआ। उसने अपनी पत्नी को बहुत प्रताड़ित किया और कहा- 'बाल वध करने वालों के लिए संसार में कहीं जगह नहीं है। अतः गंगा तट पर जाकर स्नान कर ईश्वर वन्दना करने से ही तुम इस कष्ट से मुक्ति पा सकती हो।' पति की आज्ञानुसार वणिक की पत्नी गंगा तट पर गई और वहीं रहने लगी। वणिक की पत्नी गंगा किनारे रहते हुए प्रतिदिन श्रद्धा
से पूजा करती। इस तरह जब थोड़े दिन बीत गए तो एक दिन गंगा मैया वृद्धा का रूप धारण करके आईं और वणिक की पत्नी से बोली- 'हे दुखिया तुम मथुरा नगरी जाकर कार्तिक नवमी का व्रत रखो। आंवले के वृक्ष की परिक्रमा करते हुए पूजा करना।

इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे सभी कष्ट दूर होंगे।' घर आकर वाणिक की पत्नी ने गंगा मैया द्वारा कही गई सारी बात पति को बताई। पति ने पत्नी की भलाई के लिए मथुरा नगरी को प्रस्थान किया। जब कार्तिक नवमी आई, तो पत्नी ने व्रत रखा और आंवले के वृक्ष की पूजा कर परिक्रमा दी। इस व्रत के प्रताप से वह पुनः दिव्य शरीर वाली हो गई और उसे पुत्र धन की प्राप्ति हुई। अन्त में वह स्वर्ग लोक में गई।

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